भँवर
भँवर
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वृक्ष के बोल
मेरे इस फैले हुए विस्तार में,
तुम सबने अपना बसेरा पाया है।
धूप, छाँव और इस पावन मिट्टी ने,
मुझे बड़े लाड़ से अपनाया है॥
ऐ पत्तों, तुम आते-जाते रहते हो,
बस मौसम के क्षणिक साथी हो।
ज़रा-सी हवा के झोंकों में ही,
तुम अपनी राह बदल लेते हो॥
तुम चंचल हो—हर खुशी में,
मेरे पास चले आते हो।
पर मुश्किल की एक पतझड़ आते ही,
तुम चुपचाप बिछुड़ जाते हो॥
ऐ शाखाओं, तुम पर मुझे भरोसा है,
तुम मेरा हर बोझ सहती हो।
ऊँचाइयों की ओर बढ़ते हर कदम में,
तुम मेरे संग ही रहती हो॥
पर जब तूफ़ान बहुत गहरा होता है,
तुम भी कहीं डगमगा जाती हो।
रिश्तों का जब दबाव बढ़ता है,
तुम भी आखिर टूट ही जाती हो॥
पर ऐ मेरी गहरी जड़ों,
तुम ही मेरा सच्चा आधार हो।
दुनिया को भले न दिखो तुम,
पर तुम ही मेरा सारा संसार हो॥
दुनिया चाहे जितनी बदल जाए,
तुम मिट्टी में अडिग समाई रहती हो।
मैं गिर न जाऊँ इस भीड़ में कहीं,
तुम चुपचाप मेरा भार सहती हो॥
वृक्ष की ये खामोश कहानी,
जीवन का सत्य सुनाती है—
लोग भी ऐसे ही आते-जाते,
अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं॥
पत्तों जैसे कुछ पल ठहरते,
फिर चुपके से उड़ जाते हैं।
शाखाओं जैसे रिश्ते भी,
दबाव में आकर टूट जाते हैं॥
पर जो जड़ें हैं आपके जीवन की,
वे अंत तक साथ निभाती हैं।
खामोशी में ही आपका साहस बन,
हर मुश्किल को हराती हैं॥
इसलिए उन जड़ों को पहचानो,
जो बिना कहे साथ निभाती हैं।
दुनिया की इस चकाचौंध में,
वही आपकी सच्ची पहचान बनाती हैं॥
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